“नाडीपति मिनिएचर गायों” से दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं डॉ. पी. कृष्णम राजू
भारतीय सनातन परंपरा में गाय को अत्यंत पवित्र और सम्मानित स्थान प्राप्त है। एक समय था जब हर घर में गाय परिवार के सदस्य की तरह मानी जाती थी। लेकिन शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और जगह की कमी के कारण गायें धीरे-धीरे घरों से दूर होती चली गईं। इसी स्थिति को बदलने के उद्देश्य से डॉ. पी. कृष्णम राजू ने “नाडीपति मिनिएचर गायों” परियोजना की शुरुआत की, जो आज देशभर में चर्चा का विषय बन चुकी है।
आज के दौर में छोटे घरों और अपार्टमेंट्स की बढ़ती संख्या के कारण सामान्य आकार की गायों को पालना बहुत से लोगों के लिए कठिन हो गया है। इस समस्या का समाधान खोजने के लिए डॉ. कृष्णम राजू ने लगभग 14 वर्षों तक शोध कर ऐसी विशेष भारतीय नस्ल की छोटी गायों को विकसित किया, जिन्हें घर के वातावरण में आसानी से पाला जा सके।
लगभग दो फीट ऊंचाई वाली ये मिनिएचर गायें प्रतिदिन लगभग दो लीटर तक दूध देने में सक्षम बताई जा रही हैं। डॉ. कृष्णम राजू के अनुसार, इस नस्ल को पूरी तरह प्राकृतिक चयन और प्रकृति-अनुकूल तरीकों से विकसित किया गया है।
“यह प्रकृति के विरुद्ध नहीं”
मिनिएचर गायों को लेकर उठ रही आलोचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. कृष्णम राजू कहते हैं, “दुनिया पहले ही बोनसाई पेड़, पॉकेट डॉग्स और एक्वेरियम मछलियों को स्वीकार कर चुकी है। फिर छोटे आकार की गायों को विकसित करना गलत कैसे हो सकता है?”
वे स्पष्ट करते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य विलुप्त होती भारतीय गौ नस्लों का संरक्षण है, न कि व्यावसायिक लाभ कमाना। उनका सपना है कि भारतीय गायें हर परिवार तक पहुंच सकें।
करोड़ों रुपये का निवेश
बताया जाता है कि इस परियोजना पर अब तक करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। वर्तमान में उनके संरक्षण में एक हजार से अधिक गायें हैं। गौ संरक्षण और भारतीय संस्कृति के पुनरुद्धार के लिए किए जा रहे उनके प्रयासों की कई लोग सराहना कर रहे हैं।
लोगों में बढ़ती रुचि
“काउ हग थेरेपी” जैसे नवाचारों के माध्यम से लोगों में गायों के प्रति प्रेम और भावनात्मक जुड़ाव बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। गौशाला संचालकों का कहना है कि पहले जिन गायों को केवल दूध के स्रोत के रूप में देखा जाता था, अब उन्हें परिवार के सदस्य की तरह अपनाया जा रहा है।
वैश्विक पहचान
“नाडीपति मिनिएचर गायें” अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं और दुनियाभर का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। भारतीय छोटी नस्ल की गायों के प्रति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुचि बढ़ रही है। विश्लेषकों के अनुसार, यह गौ संरक्षण की दिशा में एक अनोखा प्रयोग है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय सनातन परंपरा, गौ संरक्षण और प्रकृति-आधारित जीवनशैली को पुनर्जीवित करने का यह प्रयास भविष्य में और अधिक महत्व प्राप्त कर सकता है।
डॉ. पी. कृष्णम राजू - नाडीपथि गोशाला
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