छोटे आकार की गायें, लेकिन बड़ा संदेश – नाडीपति की "बुज्जी आवुलु" ने जीता देश का ध्यान
हाल ही में एक प्रमुख तेलुगु दैनिक समाचार पत्र में डॉ. पी. कृष्णम राजू द्वारा विकसित "बुज्जी आवुलु" (छोटी गायों) पर एक विशेष समाचार प्रकाशित हुआ। इस समाचार ने नाडीपति गोशाला में संरक्षित और विकसित की जा रही दुर्लभ देशी गायों को एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा का विषय बना दिया।
यह केवल एक समाचार नहीं है, बल्कि भारत की देशी गायों के संरक्षण, प्राकृतिक प्रजनन अनुसंधान और वर्षों की मेहनत को मिली एक महत्वपूर्ण पहचान भी है।
इन छोटी लेकिन अनोखी गायों ने आज देशभर के पशुपालकों, शोधकर्ताओं, प्रकृति प्रेमियों और गौ-प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है।
"बुज्जी आवुलु" क्या हैं?
तेलुगु भाषा में "बुज्जी आवुलु" का अर्थ है बहुत छोटी और प्यारी गायें।
नाडीपति गोशाला में विकसित की गई—
🐄 नाडीपति मिनिएचर गायें
🐄 नाडीपति माइक्रो मिनिएचर गायें
🐄 नाडीपति नैनो गायें
अपने छोटे आकार, आकर्षक रूप और शांत स्वभाव के कारण लोगों के बीच "बुज्जी आवुलु" के नाम से प्रसिद्ध हो गई हैं।
इनकी लोकप्रियता केवल इनके आकार की वजह से नहीं, बल्कि इनके पीछे वर्षों के वैज्ञानिक और प्राकृतिक अनुसंधान की वजह से भी है।
Comparison of Nadipathy Miniature Cattle
18 वर्षों की निरंतर शोध यात्रा
इन अनोखी गायों की कहानी एक दिन में शुरू नहीं हुई।
डॉ. पी. कृष्णम राजू ने पिछले 18 वर्षों से अधिक समय तक देशी गायों के संरक्षण और प्राकृतिक चयन आधारित प्रजनन (Natural Selective Breeding) पर लगातार शोध किया है।
उनका उद्देश्य था—
✔ भारत की देशी गायों का संरक्षण
✔ मूल रक्तवंश (Bloodline) को सुरक्षित रखना
✔ प्राकृतिक तरीके से छोटे आकार की गायों का विकास करना
✔ आने वाली पीढ़ियों के लिए दुर्लभ देशी नस्लों को संरक्षित करना
✔ लोगों में देशी गायों के महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना
इसी समर्पण का परिणाम है कि आज नाडीपति गोशाला दुर्लभ देशी गायों के संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र बन चुकी है।




